! यादों की जुगाली !! अटल जी के ठहाके में संभावनाओं की रौशनी……! डॉ राकेश पाठक

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० डॉ राकेश पाठक

आज अटल बिहारी बाजपेयी का 92वां जन्म दिन है।भारतीय राजनीति के अलबेले नायक। ऋषि परंपरा के संभवतः अंतिम राजनेता।
नौ दशक पहले जब ग्वालियर के कार्मल कान्वेंट चर्च का घड़ियाल आधी रात को प्रभु यीशु के जन्म का सन्देश दे रहा था तो उसी समय कुछ कदम की दूरी पर ही कमल सिंह का बाग़ में भविष्य की भारतीय राजनीति का कमल खिला था।

अनथक संघर्ष के बाद अटल जी तीन बार प्रधानमंत्री रहे।बलरामपुर, लखनऊ, विदिशा, ग्वालियर आदि आदि से जीतते हारते रहे।पहली दफा तो अटल जी ने तीन सीटों से एक साथ चुनाव लड़ा था ।दो पर हारे एक पर जीते थे।लेकिन उनकी चमक कभी फीकी नहीं हुयी।

सन् 1984 में माधव राव सिंधिया के हाथों हुयी हार ने उन्हें ग्वालियर से विमुख कर दिया।फिर वे चुनाव लड़ने कभी ग्वालियर नहीं लौटे। गाहे बगाहे वे ग्वालियर आते रहे।पत्रकारों से मिलना उन्हें खूब भाता था।
मुझे तीन बार “प्रेस से मिलिए ” कार्यक्रम में उन्हें बुलाने का मौका मिला।तब मैं “ग्वालियर जर्नलिस्ट एसोसिएशन” का अध्यक्ष था। प्रेस क्लब ग्वालियर के साथ एसोसिएशन ने जब भी अटल जी को बुलाया वे आये और खूब बतियाये।एक बार नेता प्रतिपक्ष और दो बार बतौर प्रधानमंत्री।
आखिरी बार होटल तानसेन में अटल जी का “प्रेस से मिलिए” कार्यक्रम हुआ।खूब सवाल जवाब हुए और अटल जी के ठहाकों से हॉल कई बार गूंजा।
मैं उन्हें कार तक विदा करने आया।मौका देख कर मैंने कहा – आदरणीय..
मैं भी गोरखी स्कूल और एम एल बी कॉलेज में पढ़ा हूँ ।वे सिर्फ मुस्कराये ।
तब मैंने जोड़ा – सर मैंने “स्वदेश” में भी काम किया है।

इस पर अटल जी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में जोर का ठहाका लगाया और कंधे पर हाथ रख कर बोले – ..”-भाई फिर तो राजनीति में बहुत संभावनाएं हैं। ”
अटल जी की दिखाई उम्मीद की रौशनी अब भी कभी कभी मेरे भीतर कौंध जाती है।
जन्म दिन पर हार्दिक शुभ कामनाएं।सच आज की राजनीति को आपकी बहुत ज़रूरत है।काश…