आंसू राजनीति का अमोघ अस्त्र …… @ राकेश अचल

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आंसू राजनीति का अमोघ अस्त्र
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कोई माने या न मने किन्तु मै मानता हूँ की आंसू राजनीति में अमोघ अस्त्र की तरह काम करते हैं .आंसू विहीन राजनीति शुष्क होती है .हमने देश के अनेक नेताओं को आंसू बहाते देखा है. ये आंसू कहीं सघन होते हैं तो कहीं विरल .आंसुओं की भाषा समझना आसान नहीं होता .अक्सर नासमझ लोग आंसुओं के सैलाब में बाह कर अपना अमूल्य ‘वोट’खो बैठते हैं .
मैंने अनेक तस्वीरों में महात्मा गांधी को आंसू बहाते देखा है,पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर पंडित नरेंद्र मोदी तक आंसू बहाने वाले अनेक राष्ट्रनायक हमारी नजरों के सामने से गुजरे हैं .जनता को आंसू बहते नेता बेहद अच्छे लगते हैं ,क्योंकि नेता ही हैं जो जनता को रुलाते हैं,जनता खून के आंसू बहाती है लेकिन कोई देखता तक नहीं लरतात जो नेता आंसू बहा लेता है वो अपनी नाव पानी और भंवर में तो क्या घोर कीचड़ में भी खे सकता है.आंसू हर बाधा को पर करने में सहायक होते हैं .
दुर्भाग्य देखिये की यदि कोई महिला नेत्री आंसू बहाती है तो उसे ‘त्रिया चरित्र’कहा जाता है और यदि कोई पुरुष नेता आंसू बहाता है तो उसे ‘भावुकता’कहा जाता है ,जबकि दोनों के आंसू स्वाद में ,स्पर्श में एक जैसे होते हैं,खारे,लिसलिसे .आंसुओं को लेकर ये भेद क्यों होता है मै समझने में लगा हूँ,जब समझ जाऊंगा तब जरूर साझा करूंगा आपसे .महिलाओं के आंसुओं का अपना ताप होता है. महिलाओं के आंसू लोहा,पत्थर ,शिक्षा सब पिघला सकते हैं लेकिन पुरुष के आंसू ये सब नहीं कर पाते.वे ज्यादा से ज्यादा जनता को भर्मित कर उनके वोट कबाड़ सकते हैं .
शायद ही कोई ऐसा प्रधानमंत्री हो जिसके आंसू जनता ने न देखे हों ,इंदिरा जी ने सबको रुलाया और खुद भी खूब रोयीं अटल जी भी कनखियों से रो देते थे .राजीव जी तो थे ही तरल-तरल .हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी तो जन्म से ही भावुक हैं.आंसुओं से उनका गहरा रिश्ता है .रिश्ते में आंसू उनके भाई लगते हैं,हर समय कंधे से कंधा लगाए खड़े मिलते हैं ,इन बेशकीमती आंसुओं ने अब तक कई बार डूबने से बचाया .मोदी जी के आंसुओं पर शोध करने वाले एक मीडिया हाउस की माने तो मोदी जी पंत-प्रधान चुने जाने से लेकर अब तक आठ-नौ बार आंसूलीला दिखा चुके हैं .मात्र तीन साढ़े तीन साल में मोदी जी ने आंसुओं के अस्त्र का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया है ,क्योंकि आंसूं गांधीवादी अस्त्र हैं एकदम अहिंसक ,इनसे कोई मरता नहीं लेकिन अधमरा जरूर हो जाता है .
मोदी जी के आंसुओं का हिसाब रखने वाले बताते हैं की पंत-प्रधान ने पहली बार आंसू अस्त्र का प्रयोग 2014 में किया था और आखरी इस्तेमाल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान.ताजाताजा आंसू चुनाव जीतने के बाद संसदीय दल की बैठक में बहाये गए .मोदी जी गुजरात विधानसभा से जब दिल्ली के लिए चुनकर भेजे गए तब विदाई के समय उनकी आँखों से आंसू छलके थे .
दूसरी बार 2014 में बीजेपी संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद संसद के सेंट्रल हॉल में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण ने कृपा शब्द का इस्तेमाल किया था. इसी का जवाब देते हुए नरेंद्र मोदी की आंखें से आंसू छलछला पड़े थे, उन्होंने रुंधे गल से आडवाणी से ऐसा न करने को कहा था. मोदी ने कहा था, ‘आडवाणी जी कृपा शब्द का प्रयोग न करें. मां की सेवा कभी कृपा नहीं होती, मेरे लिए बीजेपी मां के समान है और मैं उसकी सेवा करना चाहता हूं.’
आंसू देश-विदेश नहीं देखते.कहते हैं की तीसरी बार अमरीका में सितंबर 2015 को फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने पीएम मोदी से उनके संघर्षों पर सवाल पूछ लिया था. प्रधानमंत्री को अपनी मां की याद आ गई और भावुक हो गए और उनके आंसू छलक पड़े थे .बड़ी मुश्किल से वे उन्हें रोक पाए.
आंसू छलकाने में सिद्धहस्त होना जरूरी नहीं है.जिसके पास आंसू होते हैं ,छलक ही पड़ते हैं .प्रधानमंत्री चौथी बार भावुक हुए 2016 में संसद में उस समय रो पड़े थे जब संविधान पर चर्चा चल रही थी. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का जिक्र करते वक्त मोदी की आंखें भर आई थीं.किसी ने ये आंसू देखे तो किसी ने अनदेखा कर दिया .
देश ने पांचवीं बार जनवरी २०१६ में बाबा भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रीय अश्रुलीला देखी. रोहित वेमुला की मौत का जिक्र करते वक्त भी पंत प्रधान काफी भावुक हो गए थे.उनकी ऑंखें छलछला उठीं थी,गला रुंध गया था वे बोले थे की एक मां ने अपना बेटा खोया है, इसका दर्द वह महसूस कर सकते हैं.
पंतप्रधान ने अश्रुपात का छठा प्रदर्शन देश के सामने २०१६ में बेलूर मठ में किया था प्रधानमंत्री बेलूर मठ गए थे. बेलूर मठ के साथ उन्हें अपना पुराना रिश्ता याद आ गया था. मठ में उनके लिए खासतौर पर स्वामी विवेकानंद का कमरा खोला गया तो मोदी काफी भावुक हो गए. मोदी जब अपनी युवावस्था में साधु बनना चाहते थे तब इसी मठ ने 3 बार उनकी अपील को नामंजूर कर दिया था.
सातवीं बार: नवंबर 2016, में गोवा की एक सभा में नोटबंदी से हुई. हाहाकार के बाद बोलने आये मोदी जी बहुत मुश्किल से अपने आंसू जज्ब करने पड़े थे. उन्होंने कहा था, ‘मैंने.. घर-परिवार सब देश के लिए छोड़ दिया. अगर 50 दिन में सब ठीक नहीं हुआ तो चौराहे पर फांसी दे दीजिएगा..
पंत प्रधान का सबसे ताजा अश्रुपात गुजरात और हिमाचल प्रदेश में मिली जीत के बाद हुआ . प्रधानमंत्री के आंखों से निकलते जज्बातों के बांध को तोड़ ही दिया. बीजेपी संसदीय दल की बैठक में बोलते हुए उनका गला रुंध गया.इससे पहले कांग्रेस के मणिशंकर अइय्यर ने उन्हें नीच कहकर रुला दिया था .देश की खुशनसीबी है की उसके पास एक सरल-तरल पंत प्रधान है अन्यथा दुनिया में तो किम जैसे नेता भी हैं जो खुद आंसू नहीं बहाते बल्कि दुनिया को रुलाते हैं .इसलिए आइये हम सब मिलकर बोलेन -‘आंसू जिंदाबाद ‘.
@ राकेश अचल