शहादत को सलाम.. !!! ‘बिस्मिल’ ने फाँसी के पहले तीन दिन में लिखी आत्मकथा @ डॉ राकेश पाठक

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//शहादत को सलाम.. !अमर शहीद पं रामप्रसाद बिस्मिल!

!! ‘बिस्मिल’ ने फाँसी के पहले तीन दिन
में लिखी आत्मकथा

@ डॉ राकेश पाठक

आज से 90 बरस पहले, 19 दिसंबर 1927 की अलसुबह पं रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके साथियों अशफाकउल्ला,रौशन सिंह ने फांसी का फंदा चूमा था।राजेन्द्र लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को फांसी दे दी गयी थी।

आइये आज उनकी शहादत की याद करते हुए कुछ अनछुए पहलुओं पर गौर कीजिये…

काकोरी कांड के अभियुक्त पं रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के पुरखे चम्बल घाटी में मुरैना जिले के रुअर बरवाई गाँव के रहने वाले थे। बाद में वे शाहजहाँपुर चले गए।
बिस्मिल युवा अवस्था में ही क्रांतकारियों के संपर्क में आ गए थे।बिस्मिल ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।
वे आला दर्ज़े के कवि और लेखक भी थे।
बिस्मिल ने फरारी में छह किताबें लिख डालीं जिनमें कैथराइन, मन की लहर, बोलशेविकों की करतूत, स्वदेशी रंग आदि शामिल रहीं।

सबसे हैरतअंगेज बात है बिस्मिल की आत्मकथा…।

दरअसल शाहजहाँपुर से सन् 1924 में बिस्मिल गिरफ्तार हुए। अंग्रेजी हुकूमत ने तीन साल मुकदमे का नाटक किया और “काकोरी-केस” में सबको फांसी सुनाई गयी। फांसी की तारीख तय हो चुकी थी 19 दिसंबर 1927।
बिस्मिल को जेल के अनाम प्रहरी ने कागज़ कलम मुहैया कराये। तीन दिन पहले बिस्मिल ने लिखना शुरू किया और 18 दिसंबर की रात तक लिखते रहे।उसी अनाम प्रहरी ने गुप्त रूप से ये आत्मकथा जेल के बाहर पहुंचाई।

19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में वंदे मातरम् और भारत माता की जय का उदघोष करके ‘बिस्मिल’ ने कहा—विश द डाउन फॉल ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर( मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूँ)। और हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए।उस वक्त उनकी उम्र महज 30 साल थी।

! इस तरह प्रकाशित हुयी आत्मकथा

वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासकार डॉ राम विद्रोही Ram Vidrohi बताते हैं कि बिस्मिल की आत्मकथा सबसे पहले सिंध के एक प्रकाशक तक पहुंची और उसने इसे छापा।इस किताब का पता लगते ही अंग्रेजों ने इसे जब्त कर लिया।
किसी तरह इसकी एक प्रति गणेश शंकर विद्यार्थी के हाथ लग गयी। विद्यार्थी जी ने अपने “प्रताप प्रेस कानपूर” से इसे “काकोरी के शहीद” शीर्षक से प्रकाशित किया। अंग्रेजों ने इसे भी जब्त कर लिया।
आज़ादी के बरसों बाद 1988 में बनारसीदास चतुर्वेदी ने इसे सम्पादित करके प्रकाशित कराया।
डॉ विद्रोही कहते हैं- ‘ वास्तव में अंग्रेजों ने बिस्मिल की आत्मकथा को नष्ट करने की भरपूर कोशिश की इसलिए संभवतः सम्पूर्ण रूप में वह कभी उपलब्ध नहीं हुयी। फिर भी आत्मकथा जितनी जिस रूप में उपलब्ध है वो उस महान क्रांतिकारी के शौर्य और जीवट का प्रमाण है।